अब न लिख सकूँगा में
चाँद की खूबसूरती पर,
मन्दिम रौशनी पर...
की तुम्हारे दर्द की चीख लिखने नहीं देती मुझे...
मुस्कुराहट पर,
खुशियों पर....
तुम क्यों नहीं उड़ेल देती
अपने सारे दर्द मेरे कंधो पर
आंसुओ के साथ!
तुम क्यों नहीं
लिपट जाती मेरे सीने से
और बाँट लेती हो अपनी वेदनाओ को....
जानता हूँ
में भी सब...बस कुरेदता नहीं हूँ....
जख्मो को तुम्हारे...
तुम साझा कर लो...अपने सारे गम मुझसे....
या फिर इतना रहम करो,
दर्द के तूफ़ान को सीने में समेटे हुए
तुम इतना मुस्कुराओ मत.....
