Friday, 28 December 2012

अजीब वफायें

बूड़े चाँद और सूखे गुलाब को देखकर जाने कितनी ही बार 
आगोस में समां जाने पर लिखी है गजले 
सुहावने मौसम और रिमझिम बारिश में 
हाथो को थामने की कल्पनाओ पर जाने कितने पन्ने भर दिए होंगे ,

लेकिन कांपते हाथो से जब उसके कोमल हाथो को छुआ 
तो शरीर में सिरहन से दौड़ गई 
एक अजीब सा अनुनाद , तेज धड़कन ,कांपते हाथ 
जाने कैसे खुद को संभाला मेने

कितनी ही रातो को जागकर बुने थे बातो के तानेबाने 
और अब शब्द जैसे खो गए थे कही अंधियारे में ,
खामोसी में भी बयां हो रही थी किनती ही कहानियां ,

बात करते-२ तुम्हारी मुस्कुरा जाने की अदा से महक रहा हूँ में अब भी 
बीच-२ में तुम अपनी अंगूठी को छूकर 
जाने कितनी ही बातें बयां कर देती थी बिना कुछ बोले ,

शायद तुम्हे नहीं पता 
जब तुम् शर्माकर अपने होंठो में जीभ दबा लेती हो 
तब तुम्हारी मासूमियत पर हर कोई निसार होना चाहेगा ,

हँसते हुए जब मेने तुम्हारे गाल को हौले से छुआ 
तो मेरा हाथ खिल सा उठा 
जैसे रेगिस्थान में सूखे पेड़ पर बारिश की फुहार आ गई हो...

और तुम भी इस पल को जैसे बसा लेना चाहती थी दिल में अपने  
मेरी अँधेरी जिन्दगी में अपनी खुशियों को टटोलते हुए 
महसूस किया था मेनें तुम्हे ,

नहीं चाहता था की तुम्हे हर पल याद आये मेरी 
इसलिए नहीं लाया था में कोई गुलाब 
वो डॉयरी में रखा सूखा गुलाबा 
न जाने कितनी ही बार गीली करता तुम्हारी आँखे ,

फिर भी मुझसे छिपाकर तुम ले गई कुछ मेरी निशानी 
में भी जानकार अनजान रहा 
नहीं चाहता था तुम्हारा दिल तोडना बार-२,  

तुम्हारी नजरो से खुद को छिपाते हुए 
पतझड़ में गिरे पत्ते सा 
उठ खड़ा हुआ में 
कही भी उड़ जाने को  ,चरमराकर जल उठने को
तुम्हारी कसमो को कुचलते हुए 
बिना परवाह किये तुम्हारी भावनाओ की 
तुम्हे अँधेरी राह में तनहा और अकेला छोड़
तुम्हारी नजरो से बचकर अपने गालो पर आ गए आंसुओ को पौंछ 
चल दिया में ,
बिना एक बार भी पीछे मुड़कर देखे 
इस डर से की कही मेरी गीली आंखे देख तुम भी न रो दो...   
-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''

Wednesday, 19 December 2012

उम्मीद और आंसू


तुम्हे याद है उस दिन तुमने कहा था 
ऐसा कोई लम्हा नहीं होगा जब तुम्हे मेरी जरूरत हो और में तुम्हारे साथ न रहूँ...
में कितना खुश हुआ था....इसलिए नहीं की तुम मेरे दुःख बाँट लोगी...
इसलिए की इसी बहाने तुमसे मिल तो लूँगा....
लेकिन में सावन सा बरसता रहा....और तुम हवा के झोंको के संग न जाने कहा उड़ चली...
मुझे बरसता छोड़ कर..
में सूखे पत्तो सा झड़ता रहा...पतझड़ से पहले भी..और बाद भी...
या शायद तुमने सोचा की में इतने सालों तक रोया ही नहीं!!!

बुझती सिगरेट सुलगती दार्शनिकता

सिगरेट सुलगते-२ सुलग उठती है उसकी दार्शनिकता
कभी चिथड़ो में लिपटे उस बूड़े के बारे में सोचता है
जिसने उसके आपार्टमेंट के सामने आकस्मिक डेरा डाल लिया है 
तो कभी उस अभागन विधवा की चिंता करता है 
जो बच्चे के पेट की खातिर अपने जिस्म का सौदा करने को मजबूर है....
भूख से चिल्लाते पिल्लै की आवाज सुन उसका मन द्रवित हो उठता है...
दुनिया के पाखंड से घ्रणित होकर आसमान की स्वक्क्ष पवित्रता को ताकता है 
और चाँद में किसी को तलासते हुए आंसू बहता है....
फिर कोई गजल गुनगुनाने लगता है...
आईने में खुद को निहारते हुए...धीरे से मुस्कुरता है...
और सिगरेट का एक लम्बा कश मारकर उसे एश ट्रे मे डाल...
एयर कंडीसनर की कुलिंग बड़ा...मखमली बिस्तर में समां जाता है....
उसे सुबह गोल्फ खेलने जो जाना है...
कुछ ही देर में कमरा  देश दुनिया के चिन्तक के  खर्राटे से भर जाता है....
सिगरेट भी अब तक बुझ चुकी है...बस कुछ धुआं सा उड़ रहा है.....

क्यों हर बार बोलूं? मुझे बेइन्तहा मोहब्बत है तुमसे..


उम्र भर साथ चलने को हूँ तैयार क्या इतना काफी नहीं ,
क्यों हर बार बोलूं? मुझे बेइन्तहा मोहब्बत है तुमसे...
बेसक तू नहीं.......... मेरे आसपास ....
लेकिन, है दिल में हमेशा क्या इतना काफी नहीं ,
जो हर  बार बोलूं ? मुझे बेइन्तहा मोहब्बत है तुमसे.... 

Monday, 17 December 2012

परछाई का अस्तित्व !


डरता हूँ में नकारे जाने से खुद के अस्तित्व को 
और इसी उधेड़बुन में खोया रहता हूँ
भूल गया हूँ में की जब सूर्य की झुलसा देने वाली किरने मेरे सामने होंगी तो परछाई भी छिप जायेगी मेरे पीछे 
लेकिन डर कर भागने पर सबसे आगे बही होगी....
रात के डरावने अंधरे में तो वो साथ ही छोड़ देगी मेरा 
फिर क्यों में परवाह करू उसकी...जो है ही नहीं मेरा....
सही कहा गया है इतिहास सिर्फ तथ्यों पुलिंदा मात्र है 
ये भूला देता है सहीदो को सिर्फ याद रखता है खुनी जंग को
ये सिर्फ बखान करता है...अतीत का....भविष्य को देखे बगैर...
क्या है मेरा अस्तित्व...सिर्फ इतिहास!!!!!
नहीं-२ इतिहास में दफ़न होने से अच्छा है मर जाना....
या फिर सुनहरे भविष्य की तरह चमक उठने को आतुर हो उठाना....

फितरत


हाँ ये सच है फितरत होती है हमारी 
अधिकार जताने की...और प्यार भी...
ना जाने कितनी ही बार दिखाए होंगे मेने अपने आंसू तुम्हे 
न जाने कितनी ही बार  बताया होगा अपना दर्द तुम्हे 
तुम्हारे आंसू देखे बगैर...जो समाये बैठी हो तुम समंदर सी...
बिना जाने तुम्हारे मासूम चेहरे के खामोस  दर्द को...
जाने कब जान पाउँगा तुम्हारी खामोसी को 
तुम्हारी अनकही वेदनाओ को....
वो दिन याद है तुमे जब तुम जा रही थी और 
में तुमसे नाराज होकर चला गया था..बिना कुछ कहे...
बिना जाने तुम्हारी मजबूरियों को...
शायद तुम नजरे छुपाये देख रही थी मुझे 
लेकिन में एक बार भी नहीं पलटा...तुम्हारी भीगी आँखे देखने के लिए...
इसमें मेरी कोई गलती नहीं ये तो फितरत है हमारी...
पेड़ पर बैठी नन्ही चिड़िया...अपनी चंचलता से मनमोह  लेती है तुम्हारा 
ठीक उसी समय शायद में देख रहा होऊं उसे शिकार की नजर से....
ये सच है की हम होते है भावनाशुन्य 
और दिखाबा करते है कथित भावनाओ का....
कुचल कर चंचल भावनाओ को...

-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''


Sunday, 16 December 2012

कुछ यादें -अधूरे ख़त और सुखा गुलाब





आज चाँद भी पूरा निकला है 
ठीक उस दिन जैसा ही 
जिस दिन चोराहे पर बदल गई थी  राह हमारी...
लौट कर मेने तुम्हे देखा न जाने कितनी बार,
और तुम न जाने क्यों एक बार भी नहीं पलटी,,
शायद अपने आंसू छिपाने के लिए, 
तुम्हे याद होगा 
उस दिन पुराने चर्च के बगीचे में
चुप रह कर भी कितनी बाते की थी हमने
मेरे आंसू रुक नहीं रहे थे 
और तुम सैलाब को थामे चुपचाप बैठी थी ...
लेकिन तुम्हारी सुर्ख आँखे..सब कुछ वयान कर रही थी...
.मेरा दिल तो जैसे सूखे पतों सा चरमरा कर जल रहा था
लेकिन धुआं कहीं दिखाई नहीं दिया....
में रोज उस चोराहे जब निकलता हूँ तो 
बार-२ लौट कर देखता हूँ....
की काश कोई पहचाना चेहरा दिख जाये...
उस बगीचे में भी अक्सर ..सुखे पत्तो के बीच तुम्हे को ढूँढता रहता हूँ...
तुमने जो स्वेटर बुनी थी न मेरे लिए 
वो आज पहन कर जब में चर्च आ रहा था...लोग मुझे अजीब नजर से  घूर रहे थे...
और घूरे भी क्यों न ?
गर्मियों में कोई स्वेटर पहनता है भला...
आज भी इससे तुम्हारी महक आती है..
सूखे गुलाब और अधूरे खतों के आलावा यही तो तुम्हरी निसानी है...
गुलाब तो याद होगा तुम्हे...तुम्हारे जन्मदिन पर 
रात को दश बजे बाज़ार में पागलो सा गुलाब ढूँढता फिर रहा था में...
लेकिन सभी दुकाने बंद थी...
फिर एक फूल के पौधे बेचने वाले से पूरा गुलाब का पेड़ ही खरीदना पड़ा था..
एक गुलाब के लिए...तुम कितनी हंसी थी ये सब जानकर....
और उस दिन जब तुमने अधूरे ख़त के साथ यह गुलाब  वापिस दिया था....
उस दिन में कितना रोया था....तुम्हे नहीं  पता....
रोज ख़त लिखता हूँ में तुम्हे...और फिर फाड़ देता हूँ....
लेकिन आज नहीं फेंकूंगा....रखूँगा इसे सिरहाने के नीचे रोज...तुम्हारे आ जाने तक....
और मुझे पता है...तुम अपना अधूरा ख़त पूरा करने जरूर आओगी...
में इंतजार करूँगा तुम्हारा क़यामत के बाद भी....नरेन्द्र धाकड़''आमीन'

Saturday, 15 December 2012

तन्हा नौजवान


पतली झीनी चादर ओढे
कोन  चला आ रहा है ये
पतझड़ के पत्ते सा
तनहा ,
अकेला 
सूखा 
कहीं भी उड़ जाने को आतुर 
पोपले मुहं वाला ये बुड्डा 
नौजवान  सा क्यों लग रहा है....
अभी-२ तो बसंत आया है 
फिर ये सूखे पत्तो का झुरमुट कैसा?

तलाश


कुछ अधूरे ख्याब....
जिनकी तलाश में में भटक रहा हूँ.....
सदियों से.....
जाने मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं....
में बस चला जा रहा हूँ.....
एक अनजाने सफ़र पर....
तन्हाई के सफ़र पर......
यही सोचते हुए की कहीं किसी रोज मिलेगी वो.....
किसी मोड़ पर मुस्कुराते हुए....
देखते ही मुझे ले लेगी आगोस में..
या फिर कहीं वीराने में...सुनसान बैठी होगी इंतजार में मेरे.....
पतझड़ में कहीं सूखे पत्तो के बीच तलाश रही होगी मुझे.....
या शायद वो मिले किसी दरिया के पास...मेरी तन्हाई से बेखर...खिलखिलाती हुई....पानी से उठ्खेलिया करती हुई....
संभव है की मुझे मिले वो किसी  पहाड़ी पर,,,
शून्य की और ताकती हुई....खुद से ही बतयाती हुई ....
पिघलती बर्फ के बीच....खुद को पिघला देने को आतुर....या शायद सुनहरे बर्फ के बीच अतीत को याद करती हुई ....सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुनती मिले....
-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन'' 

बिछड़े तो जी न पाऊंगा

बिछड़े तो जी न पाऊंगा ,,,.. कैसे तुझे में बताऊँ,,,,,बिछड़े तो जी न पाऊंगा.....
बिन तेरे क्या महफ़िल.....में बस तनहा साहिल....
कह न सकूँ में.... तुझसे अब तो ...... बिन तेरे में रह न पाऊंगा...बिछड़े तो जी न पाऊंगा....
मेरी सांसो में तू सामिल ..... मेरी धड़कन में तू सामिल.....
किसी से कह न पाऊ...बस तनहा रह जाऊ ......
एक बात तू बस मेरी सुनले.....बिछ्फे तो जी न पाऊंगा.....
रब से भी में ...... तुझको ही मांगू,,,..हर पल में बस.... तुझको ही चाहूँ .....--२ 
कैसी दुआएं........कैसी सदायें......
हाल मेरा में ....कैसे बताऊँ,,,,,,दिल की मेरी...तुही सुनले.....
बिन तेरे में रह न पाऊंगा...बिछड़े तो जी न पाऊंगा....-२ 
होस गंवाऊ....या खुद को मिटाऊं....-२
कैसे तेरी,, याद भुलाऊं.......
बिन तेरे ,,,कहाँ में जाऊ.....

दिल की मेरी...तुही सुनले.....
बिन तेरे में रह न पाऊंगा...बिछड़े तो जी न पाऊंगा....-२ 
-नरेन्द्र धाकड़ आमीन 

नज्म


एक मुट्ठी धूप, चन्द कतरे रात के
एक बूढा आसमान और
उस पर टंगे चाँद को
समेटते हो अपने जेहन में और
रच देते हो एक नज़्म

कभी मेरे घर आकर देखो
यहाँ भी है एक बूढा बाप
शायद एक आध मुट्ठी अनाज भी मिल जाये
चन्द कतरे आंसुओं के
टूटी खाट के सिरहाने पड़े हैं
और एक चाँद यहाँ भी है जो
अक्सर भूखा सोता है
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
उधडी और फटी जिंदगियों पर..

मोहब्बत और बेवफाई पर
रंग दिए हैं तुमने ढेरों कागज़
आँखें भर आती हैं लोगों की
जब पढ़ते हैं तुम्हारी दर्द में डूबी नज़्म
कभी आओ इधर भी और देखो
मेरी माँ पड़ी है बिस्तर पर खून उगलती
मांग रही है दिन रात मौत की दुआ
पर कमबख्त वो भी नहीं फटकती इधर
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
मौत की इस बेवफाई पर...

तुम जानते हो ,
कोई नहीं देखना चाहता
चाँद ,तारों की हसीन दुनिया के परे
जब फूल और तितली पर बन सकती है
एक उम्दा नज़्म तो फिर
क्यों कोई नाली में भिनकते मक्खी मच्छर
और फटी एडियों पर लिखे कोई कविता

पर तुम लिखो....
कोई पढ़े या न पढ़े
पर तुम्हे मिल जायेगा कोई न कोई पुरस्कार
आखिर निर्णायकों का ज़रूरी है
संवेदनशील होना भी...
-पल्लवी त्रिवेदी 

Thursday, 13 December 2012

खलील जिब्रान


आपके बच्चे वास्तव में आपके बच्चे नहीं हैं
वे स्वतः प्रवाहित जीवन में पुत्र और पुत्रियाँ हैं
वे आए हैं मगर आपसे होकर नहीं
आप उन पर अपना स्नेह तो थोप सकते हैं मगर विचार नहीं
क्योंकि वे स्वयं भी विचारवान हैं, विवेकशील हैं
आप उनकी देह को कैद कर सकते हैं, मगर आत्मा को नहीं
क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में विचरती है
जहाँ तक आप नहीं पहुँच सकते, सपने में भी नहीं .
आप उन जैसा बन्ने का प्रयास तो कर सकते हैं
लेकिन उन्हें अपने जैसा नहीं बना सकते .
क्योंकि समय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता
न वह अतीत से रूककर दो बातें करता है .
आप वह धनुष हैं, जिस पर आपके बच्चे
तीर की भांति चढ़कर भविष्य की और जाते हैं
धनुर्धारी अनंत के पथ पर निशाना लगता है
और वह पूरी कोशिश करता है कि उसका तीर तेज़ी से
दूर और दूर और दूर तक जाये.
धनुर्धारी के हाथों में कसे हुए अपने धनुष को
खुशियों के लिए कसा रहने दो
उस समय भी जब वह तीर को उड़ते देख प्रसन्न हो .
क्योंकि वह उस धनुष को भी उतना ही प्यार करता है
जो हिले डुले बगैर उसके पास रहता है


२.

सात फटकार: खलील जिब्रान

(अनुवाद बी.एस. त्यागी) 

मैंने अपनी आत्मा को सात बार फटकार लगायी
पहली बार - उस समय जब कमजोर लोगों का शोषण कर
स्वयं को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया
दूसरी बार - जब मैंने उन तमाम लोगों के सामने पंगु होने का स्वांग किया
जो सचमुच पंगु थे
तीसरी बार - जब मुझे चयन करने का अवसर मिला
और कठिन को छोड़कर सरल को अपना लिया
चैथी बार - जब मैंने गलती की और दूसरों की गलती से
स्वयं को सांत्वना दी
पाँचवीं बार - जब मैं भय के कारण विनम्र हो गया था
और दावा किया था धैर्यवान होने का
छठी बार - जब कीचड़ से बचने के लिए मैंने
अपना लबादा ऊपर उठा लिया था
सातवीं बार - जब मैं प्रार्थना की पुस्तक लेकर
ईश्वर के सामने आ खड़ा हुआ और प्रार्थनागान को ही महान गुण समझ बैठा।

-खलील जिब्रान 

पतझड़

अभी-२ तो नवांकुर उपजे है 
इस बंजर जमी में ,
अभी तो बस बसंत की लहर आई है 
तुम पतझड़ की बातें न करो...
मेरे म्रदुल मन में 
अभी तो बस झंकार बजी है 
तुम कोलाहल की बातें न करो.....नरेन्द्र....

Tuesday, 11 December 2012

नहीं था कुछ तेरे मेरे दरमियाँ 
फिर क्यों ?
मेरी कब्र,
रोज आंसुओ से 
गीली करती है ?
क्यों अंधियारे में 
दीप जलाने आती है ?
महीनो बीते 
साले बीतीं 
गुजर गई कई सदियाँ 
फिर भी न जाने क्यों ?
तू रोज एक फूल चडाने आती है...
-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''



Sunday, 9 December 2012

मिलन


में तुम्हे फिर मिलूँगा
लेकिन कैसे? नहीं जानता,
शायद कभी
नज्म बनकर तुम्हारी किताबो में ,
शायद कभी
कैनवास पर उकेरे रंगों में ,
या शायद फिर कभी
जब तुम चाँद को निहार रही हो
और एकाएक में
आंसू बनकर छलक आयूं....

याद है वो अभी भी......

सपने जो कभी थे 
अपने भी 
जिनके बाकि है निशान अब बस यादों में 
नहीं कुरेदता में उन्हें अक्सर 
लेकिन कभी पुरानी किताबो में 
मिलता है कोई सूखा सा गुलाब 
और बस 
में बैठ जाता हूँ अपनी यादों का तानाबाना बुनने....
सब कुछ याद् है मुझे अब भी 
जब वो मिली थी मुझे पहली बार ,
सर्दी में ठिठुरते घायल  पिल्लै को देखा तो सभी ने था 
और बातो में संवेदना व्यक्त भी सभी ने की थी 
लेकिन उसे उठाकर 
अपने घर ले जाकर मरहम लगाने वाली सिर्फ वो थी....
तभी देखा था मेने उसे पहली बार ,पता नहीं उसने मुझे देखा भी था या नहीं!
में भी उस भीड़ में जो खड़ा सा...तमासाबीन लोगो की..
अगले दिन चाहा की उससे बात करू..लेकिन हिम्मत ही नहीं जूटा पाया उसके सामने जाने की...
पीले सलवार शूट में वो एक माशूम गुडिया सी लग रही थी... बह कुछ घबराते हुए तेजी से मेरे नजदीक से निकली...आज भी उसकी महक से मेरा साया महकता है ,
घबराते वक़्त उसके माथे पर जो बल आ गए थे न...उसकी मासूमियत पर चार चाँद लगा रहे थे...
मुझे अब भी याद है सब कुछ....
अंबुलेंस को देखकर उसका एकाएक रूकना  अपने गले के ताबीज को थामकर  आँखे बंद करके दुआ करना...
ट्राफिक में फंसे किसी बुजुर्ग को देख कर उसकी मदद के लिए दौड़ जाना...
मुझे याद है अब भी....सब कुछ....उसकी मासूम सी हंसी....उसकी अल्हड सी खिलखिलाहट...
उसका रूठना..उसका...मनाना....उसकी हर यादें...
याद है मुझे अब भी....किसी सुन्दर कविता की तरह......

यादें बाकि है अभी...

साथ न सही 
यादें बाकि है अभी 
कुछ अलमारी की नीचे की दराज में 
धुल से सने खातो में 
तो कुछ किताबों में रखे सूखे गुलाबों में...
यादें बाकि है अभी....

Tuesday, 4 December 2012

पथरीला पारितोषिक




इस दुनिया में जितनी भी पत्थरदिल औरतें हैं उनसे प्रेम करो
और उन्हें पवित्र मूर्तियों में तब्दील कर दो
जान लो वे निर्जन में छूट गई हैं अपनी कठोरता में उन्मत्त
जिनके आगे कोई दिया नहीं जलता
पथरीला पारितोषिक है यह प्रेम का कि
उनके स्वप्नों में हमेशा रुदन में लहराती अखंड ज्योति आती
आता जीवन में जो भी उनके आकार पर बेहद मस्ताता
वे अपने मुलायम रेशों को कुबेरकोष की तरह छिपातीं
कुछ सदियां ही एक पत्थर को मैं रुई कहता आया
एक सुबह उठा उसे रुई में बदला हुआ पाया


गीत चतुर्वेदी 

मनमाना





मैं रात की बग़ल में लेटा हूं
मेरी पीठ पर तुम्हारी चूड़ी का सिकुड़ा हुआ निशान है
एक करवट लेता हूं तो दब-दब जाती है सदियों पुरानी कोई नींद
मेरी उबासी स्मृति है तुम्हारे सहस्त्राब्दियों ताज़े यौवन की
मैं क्लांत मनाधीश नींद को अपना मानने की भूल करता
तुम्हारी समस्त भावनाओं का सलाद है यह क्लांति
तुम्हारा ही चमत्कार है ओ प्रेम मेरे जीवन के और जीवन के पार के भी, ओ प्रेम
कि हर्ष के बीज से अवसाद का फल उगाते हो
हृदय के रक्त में थलगंगा की क़लम लगाते हो
स्वप्नों का कौमार्य अक्षुण्ण भला क्यों होता है?
नींद का सौंदर्यशास्त्र हैं स्वप्न
नींद आती उसी तरह जैसे मनमाना करने में प्रेम जितना आनंद पाने वाली प्रेमिका
मनमाना करके प्रेम जितनी ही पीड़ा देने वाला प्रेमिका
जिसे मन से माना
उससे असंभव प्रेम की उम्मीद करता
रात की बग़ल में लेट नींद को अपनी देह पर उसके होंठों की छुअन की तरह उतरता पाने की उम्मीद में
मन को मारता उसी के इंतज़ार में डूबता अपनी थिरता में तिरता
मनमाना करने वाली आती जब तब तक प्रेम की इच्छा बारिश के बाद सूख चुकी सड़क जैसी चितकोबरी हो जाती
अपनी-सी लगने वाली नींद उगती मन और देह के क्षितिज पर
उगती रात के ख़त्म हो जाने के नारंगी घोषणापत्र की तरह
तब तक करवटों की सिलवटों से उठकर काम पर जाने की हड़बड़ी मुझे अंकवारी भर चुकी होती
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