Saturday, 15 December 2012

तन्हा नौजवान


पतली झीनी चादर ओढे
कोन  चला आ रहा है ये
पतझड़ के पत्ते सा
तनहा ,
अकेला 
सूखा 
कहीं भी उड़ जाने को आतुर 
पोपले मुहं वाला ये बुड्डा 
नौजवान  सा क्यों लग रहा है....
अभी-२ तो बसंत आया है 
फिर ये सूखे पत्तो का झुरमुट कैसा?

तलाश


कुछ अधूरे ख्याब....
जिनकी तलाश में में भटक रहा हूँ.....
सदियों से.....
जाने मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं....
में बस चला जा रहा हूँ.....
एक अनजाने सफ़र पर....
तन्हाई के सफ़र पर......
यही सोचते हुए की कहीं किसी रोज मिलेगी वो.....
किसी मोड़ पर मुस्कुराते हुए....
देखते ही मुझे ले लेगी आगोस में..
या फिर कहीं वीराने में...सुनसान बैठी होगी इंतजार में मेरे.....
पतझड़ में कहीं सूखे पत्तो के बीच तलाश रही होगी मुझे.....
या शायद वो मिले किसी दरिया के पास...मेरी तन्हाई से बेखर...खिलखिलाती हुई....पानी से उठ्खेलिया करती हुई....
संभव है की मुझे मिले वो किसी  पहाड़ी पर,,,
शून्य की और ताकती हुई....खुद से ही बतयाती हुई ....
पिघलती बर्फ के बीच....खुद को पिघला देने को आतुर....या शायद सुनहरे बर्फ के बीच अतीत को याद करती हुई ....सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुनती मिले....
-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन'' 

बिछड़े तो जी न पाऊंगा

बिछड़े तो जी न पाऊंगा ,,,.. कैसे तुझे में बताऊँ,,,,,बिछड़े तो जी न पाऊंगा.....
बिन तेरे क्या महफ़िल.....में बस तनहा साहिल....
कह न सकूँ में.... तुझसे अब तो ...... बिन तेरे में रह न पाऊंगा...बिछड़े तो जी न पाऊंगा....
मेरी सांसो में तू सामिल ..... मेरी धड़कन में तू सामिल.....
किसी से कह न पाऊ...बस तनहा रह जाऊ ......
एक बात तू बस मेरी सुनले.....बिछ्फे तो जी न पाऊंगा.....
रब से भी में ...... तुझको ही मांगू,,,..हर पल में बस.... तुझको ही चाहूँ .....--२ 
कैसी दुआएं........कैसी सदायें......
हाल मेरा में ....कैसे बताऊँ,,,,,,दिल की मेरी...तुही सुनले.....
बिन तेरे में रह न पाऊंगा...बिछड़े तो जी न पाऊंगा....-२ 
होस गंवाऊ....या खुद को मिटाऊं....-२
कैसे तेरी,, याद भुलाऊं.......
बिन तेरे ,,,कहाँ में जाऊ.....

दिल की मेरी...तुही सुनले.....
बिन तेरे में रह न पाऊंगा...बिछड़े तो जी न पाऊंगा....-२ 
-नरेन्द्र धाकड़ आमीन 

नज्म


एक मुट्ठी धूप, चन्द कतरे रात के
एक बूढा आसमान और
उस पर टंगे चाँद को
समेटते हो अपने जेहन में और
रच देते हो एक नज़्म

कभी मेरे घर आकर देखो
यहाँ भी है एक बूढा बाप
शायद एक आध मुट्ठी अनाज भी मिल जाये
चन्द कतरे आंसुओं के
टूटी खाट के सिरहाने पड़े हैं
और एक चाँद यहाँ भी है जो
अक्सर भूखा सोता है
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
उधडी और फटी जिंदगियों पर..

मोहब्बत और बेवफाई पर
रंग दिए हैं तुमने ढेरों कागज़
आँखें भर आती हैं लोगों की
जब पढ़ते हैं तुम्हारी दर्द में डूबी नज़्म
कभी आओ इधर भी और देखो
मेरी माँ पड़ी है बिस्तर पर खून उगलती
मांग रही है दिन रात मौत की दुआ
पर कमबख्त वो भी नहीं फटकती इधर
क्यों नहीं लिखते एक नज़्म
मौत की इस बेवफाई पर...

तुम जानते हो ,
कोई नहीं देखना चाहता
चाँद ,तारों की हसीन दुनिया के परे
जब फूल और तितली पर बन सकती है
एक उम्दा नज़्म तो फिर
क्यों कोई नाली में भिनकते मक्खी मच्छर
और फटी एडियों पर लिखे कोई कविता

पर तुम लिखो....
कोई पढ़े या न पढ़े
पर तुम्हे मिल जायेगा कोई न कोई पुरस्कार
आखिर निर्णायकों का ज़रूरी है
संवेदनशील होना भी...
-पल्लवी त्रिवेदी