तन्हाई का सफ़र जाने कब शुरू हुआ....कैसे हुआ ,पता नहीं...है भी या बस एक मानसिक भ्रम....ब्लॉग में परिकाल्पनिक कविताये पड़ कर कभी-२ मुझे खुद भ्रम होता है..जाने कौन है जिसने मुझे तन्हा किया...क्या मेरा अस्तित्व ही है जो कविता बनकर शब्दों में वयां होता है...और लोग प्रेयसी का भ्रम पाल लेते है..या फिर मेरी कलम का जादू जो काल्पनिक बातो को भी जिन्दा कर देते है...तन्हाई है बस कल्पनाओ में..
Saturday, 15 December 2012
तन्हा नौजवान
पतली झीनी चादर ओढे कोन चला आ रहा है ये पतझड़ के पत्ते सा तनहा , अकेला सूखा कहीं भी उड़ जाने को आतुर पोपले मुहं वाला ये बुड्डा नौजवान सा क्यों लग रहा है.... अभी-२ तो बसंत आया है फिर ये सूखे पत्तो का झुरमुट कैसा?
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