Sunday, 16 December 2012

कुछ यादें -अधूरे ख़त और सुखा गुलाब





आज चाँद भी पूरा निकला है 
ठीक उस दिन जैसा ही 
जिस दिन चोराहे पर बदल गई थी  राह हमारी...
लौट कर मेने तुम्हे देखा न जाने कितनी बार,
और तुम न जाने क्यों एक बार भी नहीं पलटी,,
शायद अपने आंसू छिपाने के लिए, 
तुम्हे याद होगा 
उस दिन पुराने चर्च के बगीचे में
चुप रह कर भी कितनी बाते की थी हमने
मेरे आंसू रुक नहीं रहे थे 
और तुम सैलाब को थामे चुपचाप बैठी थी ...
लेकिन तुम्हारी सुर्ख आँखे..सब कुछ वयान कर रही थी...
.मेरा दिल तो जैसे सूखे पतों सा चरमरा कर जल रहा था
लेकिन धुआं कहीं दिखाई नहीं दिया....
में रोज उस चोराहे जब निकलता हूँ तो 
बार-२ लौट कर देखता हूँ....
की काश कोई पहचाना चेहरा दिख जाये...
उस बगीचे में भी अक्सर ..सुखे पत्तो के बीच तुम्हे को ढूँढता रहता हूँ...
तुमने जो स्वेटर बुनी थी न मेरे लिए 
वो आज पहन कर जब में चर्च आ रहा था...लोग मुझे अजीब नजर से  घूर रहे थे...
और घूरे भी क्यों न ?
गर्मियों में कोई स्वेटर पहनता है भला...
आज भी इससे तुम्हारी महक आती है..
सूखे गुलाब और अधूरे खतों के आलावा यही तो तुम्हरी निसानी है...
गुलाब तो याद होगा तुम्हे...तुम्हारे जन्मदिन पर 
रात को दश बजे बाज़ार में पागलो सा गुलाब ढूँढता फिर रहा था में...
लेकिन सभी दुकाने बंद थी...
फिर एक फूल के पौधे बेचने वाले से पूरा गुलाब का पेड़ ही खरीदना पड़ा था..
एक गुलाब के लिए...तुम कितनी हंसी थी ये सब जानकर....
और उस दिन जब तुमने अधूरे ख़त के साथ यह गुलाब  वापिस दिया था....
उस दिन में कितना रोया था....तुम्हे नहीं  पता....
रोज ख़त लिखता हूँ में तुम्हे...और फिर फाड़ देता हूँ....
लेकिन आज नहीं फेंकूंगा....रखूँगा इसे सिरहाने के नीचे रोज...तुम्हारे आ जाने तक....
और मुझे पता है...तुम अपना अधूरा ख़त पूरा करने जरूर आओगी...
में इंतजार करूँगा तुम्हारा क़यामत के बाद भी....नरेन्द्र धाकड़''आमीन'

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