Sunday, 9 December 2012

मिलन


में तुम्हे फिर मिलूँगा
लेकिन कैसे? नहीं जानता,
शायद कभी
नज्म बनकर तुम्हारी किताबो में ,
शायद कभी
कैनवास पर उकेरे रंगों में ,
या शायद फिर कभी
जब तुम चाँद को निहार रही हो
और एकाएक में
आंसू बनकर छलक आयूं....

याद है वो अभी भी......

सपने जो कभी थे 
अपने भी 
जिनके बाकि है निशान अब बस यादों में 
नहीं कुरेदता में उन्हें अक्सर 
लेकिन कभी पुरानी किताबो में 
मिलता है कोई सूखा सा गुलाब 
और बस 
में बैठ जाता हूँ अपनी यादों का तानाबाना बुनने....
सब कुछ याद् है मुझे अब भी 
जब वो मिली थी मुझे पहली बार ,
सर्दी में ठिठुरते घायल  पिल्लै को देखा तो सभी ने था 
और बातो में संवेदना व्यक्त भी सभी ने की थी 
लेकिन उसे उठाकर 
अपने घर ले जाकर मरहम लगाने वाली सिर्फ वो थी....
तभी देखा था मेने उसे पहली बार ,पता नहीं उसने मुझे देखा भी था या नहीं!
में भी उस भीड़ में जो खड़ा सा...तमासाबीन लोगो की..
अगले दिन चाहा की उससे बात करू..लेकिन हिम्मत ही नहीं जूटा पाया उसके सामने जाने की...
पीले सलवार शूट में वो एक माशूम गुडिया सी लग रही थी... बह कुछ घबराते हुए तेजी से मेरे नजदीक से निकली...आज भी उसकी महक से मेरा साया महकता है ,
घबराते वक़्त उसके माथे पर जो बल आ गए थे न...उसकी मासूमियत पर चार चाँद लगा रहे थे...
मुझे अब भी याद है सब कुछ....
अंबुलेंस को देखकर उसका एकाएक रूकना  अपने गले के ताबीज को थामकर  आँखे बंद करके दुआ करना...
ट्राफिक में फंसे किसी बुजुर्ग को देख कर उसकी मदद के लिए दौड़ जाना...
मुझे याद है अब भी....सब कुछ....उसकी मासूम सी हंसी....उसकी अल्हड सी खिलखिलाहट...
उसका रूठना..उसका...मनाना....उसकी हर यादें...
याद है मुझे अब भी....किसी सुन्दर कविता की तरह......

यादें बाकि है अभी...

साथ न सही 
यादें बाकि है अभी 
कुछ अलमारी की नीचे की दराज में 
धुल से सने खातो में 
तो कुछ किताबों में रखे सूखे गुलाबों में...
यादें बाकि है अभी....