Thursday, 29 November 2012

कशिस

है 
कोई कशिस 
तेरी वफाओ में 
जरूर ,
यूँ 
बेवजह 
रातो में उठ-२ कर 
कोई रोता नहीं...
            -नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''

इंतजार

सो नहीं पाता में अक्सर 
रात भर 
तेरे आने के ख्याल से,
लगता है 
जैसे अगले पल ही 
तेरी पायल की खनक 
सुनाई देगी,
अँधेरी रात की 
खामोसी को तोड़कर 
बज उठेंगे 
तेरे घुंघरू 
जैसे अगले ही पल ,
इन हवाओ के संग 
तेरी खूसबू 
भी आती है अक्सर
तब लगता जैसे 
तू झांक रही हो 
दरवाजे से मुझे,
लगता है की 
जैसे तू अगले पल आ ही जाएगी 
सो नहीं पाता में  
अक्सर तेरे आने के ख्याल से....
                    -नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''

कविताये

(एक) 
माँ की झिड़की ,
गुस्से में 
पिता की पेशानी 
पर 
बन जाती थी एक खिड़की 
चिंता की लकीरों सें .......
उस पर पसीने की बूंदे !
उन बूंदों में 
तैरता मेरा भविष्य 
उन पसीने की 
बूंदों से ...सराबोर !
(दो)
सिर्फ एक बूंद 
में होती हैं वही
"ताकत"
जो दरिया में लहर 
तो सागर में कहर 
ला सकती हैं 
सिर्फ एक बूंद 
में होती हैं वही 
"तासीर"
जो आँख में आंसू 
धमनियों में लहू 
बन जाती हैं |
इस एक बूंद 
का
"स्वाद"
भी एक सा हैं 
यकीन न हो तो 
आँसू लहू और सागर 
को चख भर लें |
(तीन)
सुबह 
आँख खुलते ही 
धनवान हो 
गया 
बगीचे की घास 
पर अनगिनत 
चमकीले मोती |
पीले बांस के 
हरे पत्तों पर 
लुढ़कते 
चमकीले मोती |
सुर्ख लाल गुलाब 
एकदम लाजवाब 
उस की पंखुडियों 
पर 
चमकीले मोती |
ये ऊपर वाले की 
जादूगरी हैं 
या ओस की बूंदें |

           -अनुराग उपाध्याय 

Tuesday, 20 November 2012

व्याधा- आम आदमी की

नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे हंसने या रोने से
मेरे चिल्लाने या खामोश रहने से,
नहीं होती बदहजमी मीडिया को
मेरे डकार लेने से,
मारा जाता हूँ हमेशा ही में
कभी जाति के नाम पर
तो कभी धर्म के नाम पर
बिछा दी जाती है मेरी लाश दंगो में
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे गिड़गिडाने से,
कुचल दिया जाता हूँ में अक्सर
रोड पर भी
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरी मजबूरी से,
लूटी जाती है
मेरे घर की आबरू
बीच बाज़ारों में भी
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरी बेइज्जती से,
फिर एक दिन
घिसटते ,रेंगते
सिपाहियों की गाली खाते
पहुँचता हूँ मिलने
अपने सेवक से
छलकते जामों के बीच
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे वहां पहुँचने या न पहुँचने से......
                        -एक अभागा आम आदमी

-नरेन्द्र धाकड़ आमीन 

गूँज

न कोई स्वर
न राग
न तराना
न जाने फिर
ये दिल में
अनुनाद सा क्यों है....
कभी गूंजती है
पायल की झंकार
तो कभी घुंगरू की खनक...
खामोसी है चारो और
न जाने फिर
ये दिल में
अनुनाद सा क्यों है....

Friday, 16 November 2012

अंतहीन सफ़र

चल पड़ा हूँ
में भी
अंतहीन सफ़र की और
तेरा ये इल्जाम
सरासर गलत है
मेरे बेवफा हने का....

Saturday, 10 November 2012

आदिवासी

आदिवासी 
भाषा नहीं बोलते 
उनकी बोलियां होती हैं 

आदिवासियों का धर्म नहीं होता
बस अंधविश्वास होते हैं 

आदिवासी कला की रचना नहीं करते 
हस्तशिल्प बनाते हैं 

आदिवासी
संस्कृतियों की नहीं 
दंत कथाओं की रचना करते हैं 

आदिवासी मनुष्य नहीं 
मानव संसाधन होते हैं 

आदिवासियों के नाम नहीं होते
उनकी बस संख्या होती है 
वे कभी इतिहास में दर्ज नहीं होते बल्कि 
पुलिस की गोली से मारे जाने पर 
स्थानीय अखबार में उनका ज़िक्र होता है 

एक आदिवासी की कीमत बस एक कारतूस के बराबर होती है 

- एड्वार्दो गेलेनो ( उरुग्वे ) की कविता के अंश का भावार्थ

Thursday, 8 November 2012

अनुनाद

जैसे ही उसने कहा हेलो , ......
अंत:मन में एक पायल की झंकार सी बज गई.....
जैसे सितार पर किसी ने तरंग छेड़ दी हो..... .....
एक भावनाओ का सैलाब सा आ गया ....
एक अजीब सा दिल में अनुनाद होने लगा...
और हाथो में भी....
.सेल फोन हाथ से छूट कर जमीन पर गिरा....
और साथ में गिरा ले गया उम्मीद भी....
जमीन पर बिखर गयी तरंग ,भावनाए और अनुनाद....... 
फोन की बेटरी ,सिम ,कवर की तरह....

लापरवाह


तेरा ये इल्जाम सरासर गलत है
मेरे लापरवाह होने का ,
तेरा गम
तेरा  दर्द
तेरी यादे
और वो तेरा अधूरा ख़त.....
सदियों से दिल के करीब रखा है संभाल कर....

Wednesday, 7 November 2012

तन्हाई का सफ़र....

दुनीया के भीड़ से दूर 
किसि सुनसान राह पर 
चल पड़ा हुँ एक अनजान तलाश मे... 
हर तरफ सूनापन 
और तन्हाईयों का सफर।
भूल चुका हुँ मै अपना परिचय.....
किसि ने छोड़ा है मुझे इस राह पड़।
जारी है मेरा तन्हाईयों का सफर....!!

tanhaiyo ka aalam...

जैसे गुजरी हो तू अभी मेरे दरवाजे से ,
अब तो हवा भी तेरी पायल की खनक लगती है....