(एक)
माँ की झिड़की ,
गुस्से में
पिता की पेशानी
पर
बन जाती थी एक खिड़की
चिंता की लकीरों सें .......
उस पर पसीने की बूंदे !
उन बूंदों में
तैरता मेरा भविष्य
उन पसीने की
बूंदों से ...सराबोर !
(दो)
सिर्फ एक बूंद
में होती हैं वही
"ताकत"
जो दरिया में लहर
तो सागर में कहर
ला सकती हैं
सिर्फ एक बूंद
में होती हैं वही
"तासीर"
जो आँख में आंसू
धमनियों में लहू
बन जाती हैं |
इस एक बूंद
का
"स्वाद"
भी एक सा हैं
यकीन न हो तो
आँसू लहू और सागर
को चख भर लें |
(तीन)
सुबह
आँख खुलते ही
धनवान हो
गया
बगीचे की घास
पर अनगिनत
चमकीले मोती |
पीले बांस के
हरे पत्तों पर
लुढ़कते
चमकीले मोती |
सुर्ख लाल गुलाब
एकदम लाजवाब
उस की पंखुडियों
पर
चमकीले मोती |
ये ऊपर वाले की
जादूगरी हैं
या ओस की बूंदें |
-अनुराग उपाध्याय
माँ की झिड़की ,
गुस्से में
पिता की पेशानी
पर
बन जाती थी एक खिड़की
चिंता की लकीरों सें .......
उस पर पसीने की बूंदे !
उन बूंदों में
तैरता मेरा भविष्य
उन पसीने की
बूंदों से ...सराबोर !
(दो)
सिर्फ एक बूंद
में होती हैं वही
"ताकत"
जो दरिया में लहर
तो सागर में कहर
ला सकती हैं
सिर्फ एक बूंद
में होती हैं वही
"तासीर"
जो आँख में आंसू
धमनियों में लहू
बन जाती हैं |
इस एक बूंद
का
"स्वाद"
भी एक सा हैं
यकीन न हो तो
आँसू लहू और सागर
को चख भर लें |
(तीन)
सुबह
आँख खुलते ही
धनवान हो
गया
बगीचे की घास
पर अनगिनत
चमकीले मोती |
पीले बांस के
हरे पत्तों पर
लुढ़कते
चमकीले मोती |
सुर्ख लाल गुलाब
एकदम लाजवाब
उस की पंखुडियों
पर
चमकीले मोती |
ये ऊपर वाले की
जादूगरी हैं
या ओस की बूंदें |
-अनुराग उपाध्याय
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