Thursday, 25 July 2013

रोज ख़त लिखता हूँ में तुम्हे...और फिर फाड़ देता हूँ....
लेकिन आज नहीं फेंकूंगा....रखूँगा इसे सिरहाने के नीचे रोज...तुम्हारे आ जाने तक....
और मुझे पता है...तुम अपना अधूरा ख़त पूरा करने जरूर आओगी...
में इंतजार करूँगा तुम्हारा क़यामत के बाद भी....नरेन्द्र धाकड़''आमीन'