उसके जाने के सदियों बाद भी....दरवाजे से टकराती हैं हवाए अब भी...
तन्हाई का सफ़र जाने कब शुरू हुआ....कैसे हुआ ,पता नहीं...है भी या बस एक मानसिक भ्रम....ब्लॉग में परिकाल्पनिक कविताये पड़ कर कभी-२ मुझे खुद भ्रम होता है..जाने कौन है जिसने मुझे तन्हा किया...क्या मेरा अस्तित्व ही है जो कविता बनकर शब्दों में वयां होता है...और लोग प्रेयसी का भ्रम पाल लेते है..या फिर मेरी कलम का जादू जो काल्पनिक बातो को भी जिन्दा कर देते है...तन्हाई है बस कल्पनाओ में..
Tuesday, 28 May 2013
माँ
पहली बारिस में , मिटटी की सौंधी महक सी ''माँ''....
झुलसती गर्मी में , नीबू पानी सी माँ...
आँगन बुहारती ,घर को संभालती
अल्ह्हड़ सी , खुशमिजाज सी माँ.....
कभी हंसाती, कभी रुलाती
कभी डांटती ,कभी मनाती
कभी सीखती ,कभी सीखाती
पत्नी ,बेटी ,बहु,पड़ोसन...
एक साथ जाने कितने रिश्ते निभाती
दुनिया का एक रहस्य सी माँ....
झुलसती गर्मी में , नीबू पानी सी माँ...
आँगन बुहारती ,घर को संभालती
अल्ह्हड़ सी , खुशमिजाज सी माँ.....
कभी हंसाती, कभी रुलाती
कभी डांटती ,कभी मनाती
कभी सीखती ,कभी सीखाती
पत्नी ,बेटी ,बहु,पड़ोसन...
एक साथ जाने कितने रिश्ते निभाती
दुनिया का एक रहस्य सी माँ....
Subscribe to:
Posts (Atom)