Tuesday, 28 May 2013

उसके जाने के सदियों बाद भी....दरवाजे से टकराती हैं हवाए अब भी...
गर मेरे हालात से रूबरू होता वो....जरूर सुबक-२ कर रोता रात भर..

माँ

पहली बारिस में , मिटटी की सौंधी महक सी ''माँ''....
झुलसती गर्मी में , नीबू पानी सी माँ...
आँगन बुहारती ,घर को संभालती 
अल्ह्हड़ सी , खुशमिजाज सी माँ.....
कभी हंसाती, कभी रुलाती 
कभी डांटती ,कभी मनाती 
कभी सीखती ,कभी सीखाती
पत्नी ,बेटी ,बहु,पड़ोसन...
एक साथ जाने कितने रिश्ते निभाती 
दुनिया का एक रहस्य सी माँ....