Wednesday, 19 December 2012

उम्मीद और आंसू


तुम्हे याद है उस दिन तुमने कहा था 
ऐसा कोई लम्हा नहीं होगा जब तुम्हे मेरी जरूरत हो और में तुम्हारे साथ न रहूँ...
में कितना खुश हुआ था....इसलिए नहीं की तुम मेरे दुःख बाँट लोगी...
इसलिए की इसी बहाने तुमसे मिल तो लूँगा....
लेकिन में सावन सा बरसता रहा....और तुम हवा के झोंको के संग न जाने कहा उड़ चली...
मुझे बरसता छोड़ कर..
में सूखे पत्तो सा झड़ता रहा...पतझड़ से पहले भी..और बाद भी...
या शायद तुमने सोचा की में इतने सालों तक रोया ही नहीं!!!

बुझती सिगरेट सुलगती दार्शनिकता

सिगरेट सुलगते-२ सुलग उठती है उसकी दार्शनिकता
कभी चिथड़ो में लिपटे उस बूड़े के बारे में सोचता है
जिसने उसके आपार्टमेंट के सामने आकस्मिक डेरा डाल लिया है 
तो कभी उस अभागन विधवा की चिंता करता है 
जो बच्चे के पेट की खातिर अपने जिस्म का सौदा करने को मजबूर है....
भूख से चिल्लाते पिल्लै की आवाज सुन उसका मन द्रवित हो उठता है...
दुनिया के पाखंड से घ्रणित होकर आसमान की स्वक्क्ष पवित्रता को ताकता है 
और चाँद में किसी को तलासते हुए आंसू बहता है....
फिर कोई गजल गुनगुनाने लगता है...
आईने में खुद को निहारते हुए...धीरे से मुस्कुरता है...
और सिगरेट का एक लम्बा कश मारकर उसे एश ट्रे मे डाल...
एयर कंडीसनर की कुलिंग बड़ा...मखमली बिस्तर में समां जाता है....
उसे सुबह गोल्फ खेलने जो जाना है...
कुछ ही देर में कमरा  देश दुनिया के चिन्तक के  खर्राटे से भर जाता है....
सिगरेट भी अब तक बुझ चुकी है...बस कुछ धुआं सा उड़ रहा है.....

क्यों हर बार बोलूं? मुझे बेइन्तहा मोहब्बत है तुमसे..


उम्र भर साथ चलने को हूँ तैयार क्या इतना काफी नहीं ,
क्यों हर बार बोलूं? मुझे बेइन्तहा मोहब्बत है तुमसे...
बेसक तू नहीं.......... मेरे आसपास ....
लेकिन, है दिल में हमेशा क्या इतना काफी नहीं ,
जो हर  बार बोलूं ? मुझे बेइन्तहा मोहब्बत है तुमसे....