सिगरेट सुलगते-२ सुलग उठती है उसकी दार्शनिकता
कभी चिथड़ो में लिपटे उस बूड़े के बारे में सोचता है
जिसने उसके आपार्टमेंट के सामने आकस्मिक डेरा डाल लिया है
तो कभी उस अभागन विधवा की चिंता करता है
जो बच्चे के पेट की खातिर अपने जिस्म का सौदा करने को मजबूर है....
भूख से चिल्लाते पिल्लै की आवाज सुन उसका मन द्रवित हो उठता है...
भूख से चिल्लाते पिल्लै की आवाज सुन उसका मन द्रवित हो उठता है...
दुनिया के पाखंड से घ्रणित होकर आसमान की स्वक्क्ष पवित्रता को ताकता है
और चाँद में किसी को तलासते हुए आंसू बहता है....
फिर कोई गजल गुनगुनाने लगता है...
आईने में खुद को निहारते हुए...धीरे से मुस्कुरता है...
और सिगरेट का एक लम्बा कश मारकर उसे एश ट्रे मे डाल...
एयर कंडीसनर की कुलिंग बड़ा...मखमली बिस्तर में समां जाता है....
उसे सुबह गोल्फ खेलने जो जाना है...
कुछ ही देर में कमरा देश दुनिया के चिन्तक के खर्राटे से भर जाता है....
सिगरेट भी अब तक बुझ चुकी है...बस कुछ धुआं सा उड़ रहा है.....
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