नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे हंसने या रोने से
मेरे चिल्लाने या खामोश रहने से,
नहीं होती बदहजमी मीडिया को
मेरे डकार लेने से,
मारा जाता हूँ हमेशा ही में
कभी जाति के नाम पर
तो कभी धर्म के नाम पर
बिछा दी जाती है मेरी लाश दंगो में
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे गिड़गिडाने से,
कुचल दिया जाता हूँ में अक्सर
रोड पर भी
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरी मजबूरी से,
लूटी जाती है
मेरे घर की आबरू
बीच बाज़ारों में भी
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरी बेइज्जती से,
फिर एक दिन
घिसटते ,रेंगते
सिपाहियों की गाली खाते
पहुँचता हूँ मिलने
अपने सेवक से
छलकते जामों के बीच
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे वहां पहुँचने या न पहुँचने से......
-एक अभागा आम आदमी
-नरेन्द्र धाकड़ आमीन
मेरे हंसने या रोने से
मेरे चिल्लाने या खामोश रहने से,
नहीं होती बदहजमी मीडिया को
मेरे डकार लेने से,
मारा जाता हूँ हमेशा ही में
कभी जाति के नाम पर
तो कभी धर्म के नाम पर
बिछा दी जाती है मेरी लाश दंगो में
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे गिड़गिडाने से,
कुचल दिया जाता हूँ में अक्सर
रोड पर भी
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरी मजबूरी से,
लूटी जाती है
मेरे घर की आबरू
बीच बाज़ारों में भी
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरी बेइज्जती से,
फिर एक दिन
घिसटते ,रेंगते
सिपाहियों की गाली खाते
पहुँचता हूँ मिलने
अपने सेवक से
छलकते जामों के बीच
नहीं पड़ता किसी को फर्क
मेरे वहां पहुँचने या न पहुँचने से......
-एक अभागा आम आदमी
-नरेन्द्र धाकड़ आमीन