Wednesday, 29 May 2013

अशोक !

अशोक !
कितने षड्यंत्रकारी थे तुम 
बस एक पल में ही
धो दिए तुमने सारे खून के छीटें 
चीखती चिल्लाते 
आनाथ बच्चो की ,
विधवा पत्नी की ,
असाह बूड़े माँ बाप की ,
वेदनाओ को 
धो दिया तुमने 
बस कथित शांति अपनाकर...
एक बार भी नहीं सोचा प्रायश्चित के बारे में!!

तुमने अपनी शांति के लिए
खून बहाया
राजसत्ता का सुख भोगा
चारो और अपना यशगान करवाया
जाने कितने कलिंग ढह गए
तुम्हारे अभिमान के आगे
लोगो को कुचल कर
तुमने अर्जित की आपार शांति,
बिना परवाह किये
उनके दर्द को....
और फिर चल पड़े
शांति की राह...अपनी आंतरिक शांति के लिए...
हर बार तुमने किया सब कुछ
खुद के लिए...
फिर तुमने
ढोंग किया कथित अहिंसावादी होने का...
अशोक हर बार की तरह तुम्हारी यहाँ भी जीत हुई
सम्राट थे न! तुम...

-नरेंद्र...