अधिकार जताने की...और प्यार भी...
ना जाने कितनी ही बार दिखाए होंगे मेने अपने आंसू तुम्हे
न जाने कितनी ही बार बताया होगा अपना दर्द तुम्हे
तुम्हारे आंसू देखे बगैर...जो समाये बैठी हो तुम समंदर सी...
बिना जाने तुम्हारे मासूम चेहरे के खामोस दर्द को...
जाने कब जान पाउँगा तुम्हारी खामोसी को
तुम्हारी अनकही वेदनाओ को....
वो दिन याद है तुमे जब तुम जा रही थी और
में तुमसे नाराज होकर चला गया था..बिना कुछ कहे...
बिना जाने तुम्हारी मजबूरियों को...
शायद तुम नजरे छुपाये देख रही थी मुझे
लेकिन में एक बार भी नहीं पलटा...तुम्हारी भीगी आँखे देखने के लिए...
इसमें मेरी कोई गलती नहीं ये तो फितरत है हमारी...
पेड़ पर बैठी नन्ही चिड़िया...अपनी चंचलता से मनमोह लेती है तुम्हारा
ठीक उसी समय शायद में देख रहा होऊं उसे शिकार की नजर से....
ये सच है की हम होते है भावनाशुन्य
और दिखाबा करते है कथित भावनाओ का....
कुचल कर चंचल भावनाओ को...
-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''
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