Monday, 17 December 2012

परछाई का अस्तित्व !


डरता हूँ में नकारे जाने से खुद के अस्तित्व को 
और इसी उधेड़बुन में खोया रहता हूँ
भूल गया हूँ में की जब सूर्य की झुलसा देने वाली किरने मेरे सामने होंगी तो परछाई भी छिप जायेगी मेरे पीछे 
लेकिन डर कर भागने पर सबसे आगे बही होगी....
रात के डरावने अंधरे में तो वो साथ ही छोड़ देगी मेरा 
फिर क्यों में परवाह करू उसकी...जो है ही नहीं मेरा....
सही कहा गया है इतिहास सिर्फ तथ्यों पुलिंदा मात्र है 
ये भूला देता है सहीदो को सिर्फ याद रखता है खुनी जंग को
ये सिर्फ बखान करता है...अतीत का....भविष्य को देखे बगैर...
क्या है मेरा अस्तित्व...सिर्फ इतिहास!!!!!
नहीं-२ इतिहास में दफ़न होने से अच्छा है मर जाना....
या फिर सुनहरे भविष्य की तरह चमक उठने को आतुर हो उठाना....

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