तन्हाई का सफ़र जाने कब शुरू हुआ....कैसे हुआ ,पता नहीं...है भी या बस एक मानसिक भ्रम....ब्लॉग में परिकाल्पनिक कविताये पड़ कर कभी-२ मुझे खुद भ्रम होता है..जाने कौन है जिसने मुझे तन्हा किया...क्या मेरा अस्तित्व ही है जो कविता बनकर शब्दों में वयां होता है...और लोग प्रेयसी का भ्रम पाल लेते है..या फिर मेरी कलम का जादू जो काल्पनिक बातो को भी जिन्दा कर देते है...तन्हाई है बस कल्पनाओ में..
Thursday, 13 December 2012
पतझड़
अभी-२ तो नवांकुर उपजे है इस बंजर जमी में , अभी तो बस बसंत की लहर आई है तुम पतझड़ की बातें न करो... मेरे म्रदुल मन में अभी तो बस झंकार बजी है तुम कोलाहल की बातें न करो.....नरेन्द्र....
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