Tuesday, 11 December 2012

नहीं था कुछ तेरे मेरे दरमियाँ 
फिर क्यों ?
मेरी कब्र,
रोज आंसुओ से 
गीली करती है ?
क्यों अंधियारे में 
दीप जलाने आती है ?
महीनो बीते 
साले बीतीं 
गुजर गई कई सदियाँ 
फिर भी न जाने क्यों ?
तू रोज एक फूल चडाने आती है...
-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन''



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