Wednesday, 1 May 2013

मेरा पतझड़





















क्या यही पतझड़ है??
कुछ सूखे पत्ते 
और तपती दुपहरी ,
थोडा सा वीराना 
और कुछ खामोसी...
तो फिर कभी 
झांकना मत मेरे अंतर्मन में 
पतझड़ का वीराना 
गर्मी की झुलस 
और खामोसी की चीख..
घबरा जाओगी तुम
या शायद मुमकिन है
तुम इस पर यकीन न करो !!

-नरेन्द्र धाकड़ ''आमीन'

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