Wednesday, 10 July 2013

क्या मिला तुम्हे 
क्रन्तिकारी कविताओ से ,
सदियों से रंगते कागजो में 
तुम्हारा खून जम सा गया है
अजीब सड़ांध की बदबू
खुरदरे कागजो से आती है अब ,
तुमने कभी सोचा है 
शोषण और दमन पर लिखी 
तुम्हारी कविताये 
चीखती है चिल्लाती है 
की उन्हें चाहिए आज़ादी...
वो उतार फेक देना चाहती है तुम्हारे झूठे नकाब....
कविताओ के क्रन्तिकारी शब्द
कागजो से निकल...
बनना चाहते है...हथोडा और तलवार....

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